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Council of Scientific & Industrial Research
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय
Ministry of Science & Technology
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वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) की एक घटक प्रयोगशाला
(विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय, भारत सरकार के अधीन एक स्वायत्त संगठन)
परिचय (दृष्टि एवं उद्देश्य)
लगातार बढ़ती आबादी और ताज़े पानी के सीमित संसाधन होने के कारण पेयजल उपलब्ध कराना आज की दुनिया में एक बड़ी चुनौती बन गई है। भारत को पेय जल तक की पहुँच और पेय जल की सुरक्षा सुनिश्चित करने से संबंधित बहुआयामी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। भारत के कई राज्यों को अपने नागरिकों को सुरक्षित जल आपूर्ति के संबंध में भारी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। भारत की आबादी के लगभग 54% लोग जल को लेकर उच्च से बहुत उच्च तनाव का सामना करते हैं। उपलब्ध सतही जलाशय जैसे कि झीलें/ तालाब/ नदियाँ भी संदूषित हैं और बैक्टीरिया की दृष्टि से पीने के लिए असुरक्षित है। कुछ स्थानों के भूजल भूजनित संदूषकों जैसे कि फ्लोराइड, आर्सेनिक, लोहा, यूरेनियम, नाइट्रेट आदि से संदूषित हैं, जो इसे पीने के लिए अयोग्य बनाता है। शहरों में, बढ़ती आबादी और परिधि के साथ, मलजल उत्पन्न होता है जो मौजूदा अवसंरचनाओं द्वारा पूरी तरह से प्रबंधित नहीं होता है और जलाशयों में छोड़ दिया जाता है। 2015 के दौरान, देश में अनुमानित मलजल उत्पादन 22963 एमएलडी की विकसित मलजल उपचार क्षमता (केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, 2015) के प्रति 61754 एमएलडी था। इन सभी कारकों से दिन-प्रतिदिन पानी की मात्रा घटती जा रही है और गुणवत्ता असुरक्षित होती जा रही है और कई एजेंसियों ने इसे यथा संभव मौलिक रखने की चुनौती स्वीकार की है। अधिक और सुरक्षित पानी की मांग में वृद्धि के बावजूद, हम में से कई लोगों द्वारा इस बहुमूल्य सम्पदा को आम लोगों के लिए सुलभ बनाने के लिए विवेकपूर्ण प्रयास किए जा रहे हैं। भारत में मुख्य रूप से आबादी में वृद्धि और उद्दाम शोषण के कारण प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता में धीरे-धीरे आती गिरावट ने हमें पानी बचाने के लिए विवेकपूर्ण प्रथाओं को सिखाया और उन्हें अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया है; कई पारंपरिक और उभरते रासायनिक संदूषकों के आगमन और रोगजनक सूक्ष्मजीवों के बहुतायत ने उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए पानी को पीने योग्य बनाने के लिए आविष्कार और उपचार को प्रोत्साहित किया है।
जल प्रौद्योगिकी और प्रबंधन प्रभाग (डब्ल्यूटीएमडी) की स्थापना पानी से संबंधित मुद्दों को संबोधित करने और जल गुणवत्ता अनुवीक्षण और निगरानी, जल उपचार, जल रक्षा योजना, जल सुरक्षा योजना, संदूषक पारगमन अध्ययन, जलीय-भूगर्भीय अन्वेषण और जल लेखापरीक्षण से संबंधित विकास एवं अनुसंधान गतिविधियाँ निष्पादित करने के उद्देश्य और दृष्टि के साथ की गई थी। डब्ल्यूटीएमडी का निरंतर दक्षता और किफायती कीमत पर बड़े और छोटे समुदायों को पीने योग्य पेयजल उपलब्ध कराने के लिए सतही और भूजल उपचार के क्षेत्र में विभिन्न प्रौद्योगिकी/ प्रक्रियाओं के विकास का एक इतिहास है। 60 और 70 के दशक में विकसित नालगोंडा फ्लोराइड निष्कासन तकनीक एक महत्वपूर्ण योगदान था। इसे एक कुशल और लागत प्रभावी तकनीक के रूप में पहचाना गया था, जो अभी भी केन्या, इथियोपिया और तंजानिया जैसे देशों में प्रचलन में है। डब्ल्यूटीएमडी में किए जा रहे कार्यों को भारत सरकार के बड़े अभियानों जैसे कि स्वस्थ भारत, स्वच्छ भारत, मेक इन इंडिया, इनोवेट इन इंडिया और नमामि गंगे के साथ निकटता से संरेखित किया गया है। डब्ल्यूटीएमडी में 11 वैज्ञानिक / तकनीकी और लगभग 20 शोधकर्ताएं/ परियोजना कार्मिक हैं और लगभग 20 बड़ी परियोजनाएं हैं जिनका कुल संविदात्मक मूल्य 125 मिलियन भारतीय रुपए हैं।
डब्ल्यूटीएमडी भारत में जल एवं स्वच्छता के लिए डब्ल्यूएचओ के साथ सहयोग करने वाला एकमात्र केंद्र है।
प्रमुख अनुसंधान क्षेत्र
प्रौद्योगिकी विकास एवं कार्यान्वयन
डब्ल्यूटीएमडी ने ऐतिहासिक रूप से कई प्रौद्योगिकियों का विकास किया है जैसे कि फ्लोराइड निष्कासन के लिए नालगोंडा तकनीक, पॉट क्लोरीनेटर आदि। निम्नलिखित प्रौद्योगिकियां अभी भी प्रचलित हैं:


सौर ऊर्जा आधारित नीरझर वहनीय त्वरित जल निस्यंदक विद्युत फ्लोराइड निष्कासन संयंत्र
उपकरणों


परियोजनाएं (बहुपक्षीय एवं द्विपक्षीय सहयोगात्मक परियोजनाएं)



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आयुध निर्माणी अम्बाझारी, नागपुर में शुरू की गई उपचार संयंत्र |
परियोजनाएं (भारत सरकार की मंत्रालयों/ विभागों द्वारा समर्थित)



परियोजनाएं (राज्य सरकार की संगठनों द्वारा समर्थित)
